Friday, 10 July 2015

शबनम लबो से टपका दिये तुम











तुम सुबह सवेरे जो भीग  के निकले                            
कितने ही अरमां  इस दिल मे मचले
जमाने का हमको ख्याल जो आया
पागल दिल भी लगा था सम्भलने
पर
शबनम लबो से टपका दिये तुम
सांसे हमारी ही अटका दिये तुम
                         ………………………………..     १

हमको भाने लगी है पुरवाईयां अब
काटे कटती नही है तन्हाईयां अब
बाते करने लगे है सब यार अपने
होने लगी है ……. रुसवाईयां अब

जूं छोटा सा हमको इशारा दिये तुम
आचंल को अपने लटका दिये तुम
पर
सांसे हमारी ही अटका दिये तुम
शबनम लबो से टपका दिये तुम
                       …………………………………   २
याद आ रही हो इबादत से पहले
पास आ रही हो शरारत से पहले
जब आ ही गयी हो........... तो
क्यो जा रही हो महोब्बत से पहले

क्यों हमसे ही ऐसे घबरा दिये तुम
आंचल को अपने सिमटा दिये तुम
पर
सांसे हमारी ही अटका दिये तुम
शबनम लबो से टपका दिये तुम
                       …………………………………   ३


-जितेन्द्र तायल
मोब. 9456590120

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13 comments:

  1. अति सुन्दर सर।

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  2. अति सुन्दर सर।

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    1. बहुत आभार मित्रवर

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  3. वाह बहुत सुंदर और मन को छूती रचना
    बधाई

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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  4. Replies
    1. बहुत शुक्रिया आदरणीया

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  5. हमको भाने लगी है पुरवाईयां अब
    काटे कटती नही है तन्हाईयां अब
    बाते करने लगे है सब यार अपने
    होने लगी है ……. रुसवाईयां अब

    सुन्दर पंक्तियाँ
    आभार

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    1. सादर नमन आदरणीया

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  6. sundar warnan .....dil ke bhawon ka

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    1. बहुत शुक्रिया आदरणीया

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