Monday, 18 May 2015

बेटी बचाओ















खाना-पीना मजे करना, कोई जिम्मेदारी नही निभाते है          
इस मस्ती मे जानते ही नही ये जीवन कैसे बिताते है
बच्चे होने से पहले तो सब खुद बच्चे से होते है
बच्चे ही है जो जीवन मे आकर बडा हमे बनाते है

अपने बच्चो की खुशी को हम घोडा बन खिलाते है
अपने घुटनो का झूला भी बना, खूब उन्हे झुलाते है
पर क्या ये सच नही कि, अपना खोया बचपन है यें
इनको खिलाने के बहाने, हम खुद को ही बहलाते है

इस दुनिया के सारे जन्तु सन्तान पे जान लुटाते है
केवल सर्प ही सुने है जो अपने बच्चो को खाते है
ऐसा क्या अपराध किया उस नन्ही बिटिया ने की
हम विषधर बनने मे भी इक पल न सकुचाते है

कवि तो अपनी कलम से इस देश को तो जगाते है
पर देश तो हम सब देशवासी अपने घर से बनाते है
नारी अधिकारो पर लिखना तो अब फैशन हो गया है
क्या सचमुच अपने हम घर मे अपना धर्म निभाते है

 - जितेन्द्र तायल

 (स्वरचित) कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

8 comments:

  1. ऐसा क्या अपराध किया उस नन्ही बिटिया ने की
    हम विषधर बनने मे भी इक पल न सकुचाते है
    सुंदर पंक्तियाँ जितेन्द्र जी।

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    1. बहुत आभार आदरणीया
      आपकी प्रतिक्रिया हमेशा कलम को प्रोत्साहित करती है

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  2. बिल्‍कुल सही कहा आपने। जब बचेंगीं बेटिया तभी बचेंगें बेटे।

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    1. जी कहकशां जी मेरी कुछ पक्तियां और है जो सही हाल बयान करती है गौर फरमायें....

      इस दुनियां मे बेटियां, दोनो जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं
      पिता की राजकुमारी है तो, पति की परछाई भी कहलातीं है
      बेटियां है तो ये घर, नगर, वतन सब और ये जहान है
      जानते तो है सब पर, ये मानना बडा इम्तिहान है

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    1. बहुत आभार आदरणीया

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  4. इस दुनिया के सारे जन्तु सन्तान पे जान लुटाते है
    केवल सर्प ही सुने है जो अपने बच्चो को खाते है ..
    इंसान तो सर्प से भी आगे निकल गया है आज ... जाने कब जागेगा और लड़कियों को बेटियों को बचाएगा ...

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    1. ठीक कहा आपने आदरणीय

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